Anokha Love Story Part - 2: जब परदेस में संजू का टूट गया हौसला और जेब में बचे थे सिर्फ 100 रुपये

 कल की कहानी में आपने पढ़ा कि कैसे एक 14 साल का मासूम संजू अपने घर के हालातों को बदलने के लिए परदेस जाने का फैसला करता है। पिता की अनुमति मिलने के बाद संजू की खुशी का ठिकाना नहीं था। लेकिन मासूम संजू को यह अंदाज़ा नहीं था कि घर से दूर अनजान शहरों की दुनिया कितनी बेरहम होती है। आइए जानते हैं उसके बाद क्या हुआ।

वो तारीख और परदेस का सफर

तारीख थी 24 मई 2008। शाम के ठीक 5:00 बजे संजू अपने गाँव के लड़कों के साथ परदेस जाने के लिए ट्रेन में बैठ गया। ट्रेन जब धीरे-धीरे स्टेशन से आगे बढ़ने लगी, तो संजू का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए संजू की आँखों में बार-बार अपनी माँ का रोता हुआ चेहरा आ रहा था। वह मन ही मन सोच रहा था कि माँ ने कहा था, "बेटा, तू अभी बहुत छोटा है, परदेस की दुनिया बहुत अलग होती है।" लेकिन संजू ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और खुद को संभाला, क्योंकि अब वह अपने परिवार का सहारा बनने निकल चुका था।

ठेकेदार का धोखा और परदेस का कड़वा सच

सफ़र ख़त्म हुआ और संजू चेन्नई (Tamil Nadu) के एक छोटे से गाँव में पहुँच गया। वहाँ पहुँचते ही उसे परदेस का पहला कड़वा सच पता चला। जिस ठेकेदार के भरोसे वे गाँव से आए थे, वह एक नंबर का धोखेबाज़ निकला। उसने संजू को एक छोटी सी कंपनी में हेल्पर (Helper) के काम पर लगा दिया, जहाँ दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।

दिन बीतते गए और संजू ने पूरी ईमानदारी से एक महीना दिन-रात एक करके काम किया। जब महीना ख़त्म हुआ, तो संजू बहुत खुश था कि आज उसे उसकी पहली कमाई मिलेगी, जिसे वह सीधे अपनी माँ के पास घर भेजेगा। लेकिन जब वह ठेकेदार के पास पैसे मांगने गया, तो ठेकेदार ने साफ़ मना कर दिया और कहा, "अभी कोई सैलरी नहीं मिलेगी, अगले महीने आना।" यह सुनते ही 14 साल के संजू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह उदास होकर अपने कमरे में लौट आया।

जब जेब में बचे थे सिर्फ 100 रुपये

देखते-देखते दूसरा महीना भी बीत गया, लेकिन उस ज़ालिम ठेकेदार ने संजू को एक रुपया भी नहीं दिया। संजू के पास खाने तक के पैसे नहीं बचे थे। जब उसने बहुत मिन्नतें कीं, तो ठेकेदार ने गुस्से में संजू के हाथ पर सिर्फ 100 रुपये रख दिए और कहा, "इतने में ही काम चलाओ, नहीं तो काम छोड़कर भाग जाओ।"

उस रात संजू कमरे के एक कोने में बैठकर फूट-फूटकर रोया। अनजान शहर, जेब में सिर्फ ₹100 और घर जाने का कोई रास्ता नहीं। उसे अपनी माँ की कही एक-एक बात याद आ रही थी।

माँ से बोला गया वो आखिरी झूठ

उसी समय कमरे में रखे एक मोबाइल पर संजू के घर से फोन आया। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से माँ की ममता भरी आवाज़ गूँजी, "बेटा संजू, कैसा है तू? वहाँ सब ठीक तो है ना? खाना अच्छे से खाया ना?"

माँ की आवाज़ सुनते ही संजू का गला भर आया, आँखों से आँसू बहने लगे। वह चीख-चीखकर माँ को बताना चाहता था कि माँ, मैं यहाँ बहुत मुसीबत में हूँ, मुझे घर बुला लो। लेकिन संजू ने अपने आँसुओं को छुपाया, अपनी आवाज़ को कड़ा किया और अपनी माँ से ज़िंदगी का सबसे बड़ा झूठ बोला— "हाँ माँ, मैं यहाँ बहुत अच्छा हूँ। आज मुझे मेरी सैलरी भी मिल गई है और मैंने अच्छे से खाना भी खा लिया है। तुम मेरी चिंता बिल्कुल मत करना।"

फोन कटने के बाद संजू ज़मीन पर बैठकर रोने लगा। उसे नहीं पता था कि आने वाले अगले ही दिन उसके साथ कुछ ऐसा होने वाला है, जिसे वह चाहकर भी अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं भूल पाएगा...

Part:3 coming soon 
(Part - 2 समाप्त)

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